Farming The Constitution | संविधान का निर्माण (एक नए युग की शुरुआत) Chapter 15 | Class 12th History
संविधान का निर्माण (एक नए युग की शुरुआत)
Class 12 | Chapter 15
हिंदी नोट्स
याद रखने योग्य बातें
- भारतीय संविधान संसार का सबसे लंबा संविधान है। स्वतंत्रता के समय भारत पूरी तरह बिखरा हुआ देश भी था। ऐसे में देश में एकजुटता और प्रगति के लिए विस्तृत तथा सूझबूझ पर आधारित संविधान आवश्यक था।
- अगस्त 1946 में कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी। इसके साथ ही उत्तरी तथा पूर्वी भारत में लगभग साल भर तक चलने वाले दंगे-फसाद और हत्याओं का दौर आरंभ हो गया था। हिंसा के इस दौर में भीषण जनसंहार इसके साथ ही देश के विभाजन की घोषणा कर दी गई और असंख्या लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे।
- 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर आनंद और उम्मीद का वातावरण था परन्तु भारत के बहुत-से मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं तथा सिखों के लिए यह एक निर्मम क्षण था। उन्हें मृत्यु अथवा अपनी पीढ़ियों पुरानी जगह छोड़ने के बीच चुनाव करना था।
- ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक-तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के अधीन था जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। उनके पास अपने राज्य को अपनी मनमर्जी से चलाने की काफी आजादी थी।
- मुस्लिम लीग ने स्वतंत्रता के पूर्व की संविधान सभा की बैठकों का बहिष्कार किया जिसके कारण उस दौर में संविधान सभा एक ही पार्टी का समूह बनकर रह गई थी। सभा के 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस के सदस्य थे।
- संविधान सभा में होने वाली चर्चाएँ जनमत से भी प्रभावित होती थीं। विभिन्न पक्षों के तर्क अखबारों में भी और जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति या असहमति पर गहरा प्रभाव पड़ता था
- "ऐतिहासिक उद्देश्य" प्रस्ताव नेहरू ने पेश किया था यह प्रस्ताव भी उन्होंने ही पेश किया था कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज "केसरिया, सफेद और गहरे हरे रंग की तीन बराबर चौड़ाई वाली पट्टियों का तिरंगा" होगा जिसके बीच में एक नीले रंग का चक्र होगा।
- कांग्रेस के त्रिगुट के अतिरिक्त प्रसिद्ध विधिवेत्ता और अर्थशास्त्री बी. आर. अंबेडकर भी सभा के सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे। उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया उनके साथ दो और वकील काम कर रहे थे।
- अंबेडकर पर सभा में संविधान के प्रारूप को पारित करवाने की जिम्मेदारी थी। इस काम में कुल मिलाकर 3 वर्ष लगे और इस दौरान हुई चर्चाओं के मुद्रित रिकॉर्ड 11 खंडों में प्रकाशित हुए।
- पं. नेहरू ने अपने भाषण में कहा था कि भारतीय संविधान का उद्देश्य लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश करना होगा।
- संविधान सभा स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन मानी जा रही थी। लोकतंत्र, समानता तथा न्याय के आदर्श 19वीं शताब्दी से भारत में सामाजिक संघर्षों के साथ जुड़ चुके थे। समाज-सुधारकों द्वारा बाल-विवाह का विरोध तथा विधवा-विवाह का समर्थन सामाजिक न्याय से ही प्रेरित था।
- प्रतिनिधित्व की मांग बढ़ने के साथ-साथ अंग्रेजो को चरणबद्ध ढंग से संवैधानिक सुधार करने पड़े। प्रांतीय सरकारों में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई कानून (1909, 1919 और 1935) पारित किए गए।
- पृथक निर्वाचिका के पक्ष में दिए गए तकों से राष्ट्रवादी भड़क उठें। अधिकतर राष्ट्रवादियों को लग रहा था कि पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था लोगों को बाँटने के लिए अंग्रेजों की चाल थी।
- विभाजन को देखते हुए तो राष्ट्रवादी नेता पृथक निर्वाचिका के प्रस्ताव पर और अधिक भड़कने लगे । उन्हें निरंतर गृह-युद्ध, दंगों और हिंसा की आशंका दिखाई दे रही थी। सरदार पटेल ने कहा था कि पृथक निर्वाचिका एक ऐसा "विष है जो हमार देश की पूरी राजनीति में समा चुका है।
- सभी मुसलमान भी पृथक निर्वाचिका की माँग के समर्थन में नहीं थे। उदाहरण के लिए बेगम ऐजाज रसूल का कहना था कि पृथक निर्वाचिका आत्मघाती सिद्ध होगी क्योंकि इससे अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों से कट जाएँगे।
- एन.जी. रंगा ने आदिवासियों को भी अल्पसंख्यकों में गिनाया था इस समय के प्रतिनिधियों में जयपाल सिंह जैसे जबरदस्त वक्ता भी शामिल थे। वह पृथक निर्वाचिका के पक्ष में नहीं थे परन्तु उन्हें भी यह लगता था कि विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था जरूरी है।
- संविधान सभा में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के अधिकारों पर भी काफी बहस हुई। जवाहरलाल नेहरू शक्तिशाली केन्द्र के पक्ष में थे। संविधान सभा के अध्यक्ष के नाम लिखे पत्र में उन्होंने कहा था, दुर्बल केन्द्रीय शासन को व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी क्योंकि ऐसा केन्द्र शांति स्थापित करने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश की आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा।
- संविधान के प्रारूप में विषयों को तीन सूचियों में बाँटा गया था-केन्द्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। पहली सूची के विषय केन्द्र सरकार के अधीन होने थे, जबकि दूसरी सूची के विषय राज्य सरकारों के अधीन आते। तीसरी सूची के विषय केन्द्र और राज्य, दोनों की साझा जिम्मेदारी थे।
- राज्यों (प्रांतों) के अधिकारों का सबसे शक्तिशाली समर्थन मद्रास के सदस्य के संतनम ने किया। उन्होंने कहा कि न केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए भी शक्तियों का पुनर्वितरण आवश्यक है। यदि केन्द्र के पास आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा।
- संविधान सभा में भाषा के प्रश्न पर कई महीनों तक वाद-विवाद हुआ। तीस के दशक तक कांग्रेस ने यह मान लिया था कि हिन्दुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए। महात्मा गाँधी का मानना था कि सभी को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिन्दुस्तानी हिन्दी और उर्दू के मेल से बनी भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी।
- धुलेकर चाहते थे कि हिन्दी को राजभाषा नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए। उन्होंने उन लोगों की आलोचना की जो यह सोचते थे कि हिन्दी को उन पर थोपा जा रहा है।
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