Class 12th History | Chapter 6 | Bhakti Sufi Traditions | Hindi Notes
भक्ति सूफी और परम्पराएँ
Class 12 | Chapter 6
हिंदी नोट्स
याद रखने योग्य बातें
- नए साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ शामिल हैं उन्होंने इन रचनाओं में अपने- आप को जनसाधारण की क्षेत्री भाषाओं में मौखिक रूप से व्यक्त किया था इनमें से अधिकतर रचनाएँ संगीतबद्ध है
- देवी की आराधना पद्धति को प्राय: 'सात्रिक ' नाम से जाना जाता है। तांत्रिक पूजा पद्धति उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी। इसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल हो सकते थे।
- वैदिक परंपरा के प्रशंसक उन सभी तरीकों की निंदा करते थे जो ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण तथा यज्ञों के विपरीत थे दूसरी और वे लोग थे जो तांत्रिक आराधना में लगे थे और वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे।
- भक्ति परंपरा में मंदिरों में इष्टदेव की आराधना से लेकर उपासकों का प्रेमभाव में तल्लीन हो जाना शामिल था। भक्ति रचनाओं का उच्चारण अथवा गान इस उपासना पद्धति के अंश थे।
- धर्म के इतिहासकार भक्ति परंपरा को दो मुख्य वर्गों में बाटते हैं : सगुण मक्ति और निर्गुण भक्ति। प्रथम वर्ग में शिव, विष्णु तथा उनके अवतार और देवियों की मूर्त रूप (साकार) में उपासना शामिल है।
- निर्गुण भक्ति में अमूर्त अथवा निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी।
- प्रारंभिक भक्ति आंदोलन तमिलनाडु के अलवारों और नयनारों के नेतृत्व में चला। अलवार विष्णु के तथा नयनार शिव के भक्त थे। वे स्थान-स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल भाषा में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
- कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति-प्रथा तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध आवाज उठा कुछ सीमा तक यह बात सत्य प्रतीत होती है ।
- तमिल भक्ति रचनाओं की एक मुख्य विषय-वस्तु बौद्ध और जैन धर्म के प्रति उनका विरोध है। इतिहासकारों ने इस विरोध का कारण यह बताया है कि इन धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान प्राप्त करने की होड़ लगी हुई थी।
- शक्तिशाली चोल शासकों ने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा को समर्थन दिया। उन्होंने विष्णु तथा शिव के मंदिरों के निर्माण के लिए भूमि-अनुदान दिए।
- 12वीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नए आंदोलन का उद्भव हुआ जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया। इनके अनुयायी वीरशैव तथा लिंगायत कहलाए।
- लिंगायतों ने जाति और कुछ समुदायों के "दूषित" होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्नवाचक चिह्न लगाया।
- अनेक नए धार्मिक नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और अपने विचार आम लोगों की भाषा में सामने रखे। समय के साथ-साथ इन भाषाओं में वह रूप धारण कर लिया जिस रूप में ये आज प्रयोग में लाई जाती है।
- 711 ईसवी में मुहम्मद-विन-कासिम नामक एक अरब सेनापति ने सिंध पर विजय प्राप्त की और उसे खलीफा के क्षेत्र में शामिल कर लिया।
- सैद्धांतिक रूप से मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था। उलमा से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे शासन का शरिया के अनुसार चलना सुनिश्चित करवाएँ।
- मुस्लिम शासक शासितों के प्रति काफी लचीली नीति अपनाते थे। अनेक शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई वथा यहूदी धर्म संस्थाओं को भूमि अनुदान दिए तथा कर में छूट दी।
- मसजिदों के कुछ स्थापत्य संबंधी तत्व सभी जगह एक समान थे, जैसे कि इमारत का मक्का की ओर संकेत करना जी मेहराव (प्रार्थना का आला) तथा मिनबार (व्यासपीठ ) की स्थापना से लक्षित होता था।
- हिंदू तथा मुसलमान जैसे शब्दों का कोई प्रचलन नहीं था। लोगों का वर्गीकरण उनके जन्म-स्थान के आधार पर किया जाता था ।
- प्रवासी समुदायों के लिए अधिक सामान्य शब्द मलेच्छ था वह नाम इस बात की ओर संकेत करता है कि वे वर्ण व्यवस्था के नियमों का पालन नहीं करते थे और ऐसी भाषाएँ बोलते थे जो संस्कृत से नहीं निकली थीं।
- इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोगों का झुकाव रहस्यवाद तथा वैराग्य की ओर बढ़ने लगा। इन लोगं को सूफी कहा गया। सूफियों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुनना ( पैगबर के व्यवहा को बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की।
- सिलसिले का शाब्दिक अर्थ है-जंजीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरतर रिश्ते की प्रतीक है। इस रिश्ते की पहली अटूट कड़ी पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था।
- कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नए आंदोलनों की नींव रखी। ये रहस्यवादी खानका का तिरस्कार करके फकीर का जीवन बिताते थे। उन्होंने निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव प्रदान किया। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि नामों से जाना जाता था।
- खानकाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदु था। शेख से मिलने वालों में अमीर हसन सिजजी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा।
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