विभाजन को समझना राजनीति, स्मृति, अनुभव
विभाजन को समझना राजनीति, स्मृति, अनुभव
Class 12 | Chapter 14
हिंदी नोट्स
याद रखने योग्य बातें
- 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप में जो कुछ हुआ उसकी भीषणता को होलोकॉस्ट' शब्द से ही समझा जा सकता है। यह घटना इतनी जघन्य थी कि 'विभाजन', 'बँटवारे' जैसे शब्दों से उसके सभी पहलू सामने नहीं आ पाते।
- भारत में पाकिस्तान से घृणा करने वाले और पाकिस्तान में भारत से भणा करने वाले दोनों ही बैटवारे की उपज हैं कई बार लोग यह मान लेते हैं कि भारतीय मुसलमानों की वफदारी पाकिस्तान के साथ है।
- विभाजन ने ऐसी स्मृतियाँ, घृणाएँ, छवियाँ और पहचानें रच दी हैं कि से आज भी सीमा के दोनों ओर लोगों के इतिहास को तय करती चली जा रही है। ये भृणाएँ सामुदायिक टकरावों में स्पष्ट झलकती हैं।
- कुछ बिहान यह मानते हैं कि देश का विभाजन उस सांप्रदायिक राजनीति का अंतिम बिदु था जो 20वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में शुरू हुई। इनका सके है कि अंग्रेजों द्वारा 1000 में मुसलमानों के लिए बनाए गए पृथक् चुनाव क्षेत्रों का सांप्रदायिक राजनीति पर गहरा प्रभाव रहा। इली राजनीति का अंतिम परिणाम विभाजन था।
- मुलमानों के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा परन्तु मुस्लिम लीग भी इन क्षेत्रों में बहुत या नहीं कर पाई। उसे इस चुनाव में संपूर्ण मुस्लिम चोट का केवल 4.4 प्रतिशत भाग ही मिल पाया। उत्तर-पश्चिम सीमा पाक में से एक सीट भी नहीं मिली।
- संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी। परन्तु यहाँ कांग्रेस ने अपना संपूर्ण बहुमत होने के कारण लीग की इस मांग को ठुकरा दिया। कुछ विद्वानों का तर्क है कि इससे लीग के सदस्यों के मन में बात घर कर गई कि यदि भारत अविभाजित रहा तो मुसलमानों के हाथ में राजनीतिक सत्ता कभी नहीं आ पाएगी।
- कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान के गठन की माँग उर्दू कवि मोहम्मद इकबाल से आरंभ होती है। 1930 में मुस्लिम लोग के अधिवेशन में अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए उन्होंने एक "उत्तर-पश्चमी भारतीय मुस्लिम राज्य" की स्थापना पर बल दिया था परन्तु उस भाषण में इकबाल एक नए देश के उदय पर नहीं बल्कि पश्चिमोत्तर भारत में मुस्लिम बहुल इलाकों की एक स्वायत्त इकाई की स्थापना पर बल दे रहे थे।
- दूसरे विश्व-युद्ध के कारण अंग्रेजों को स्वतंत्रता के बारे में औपचारिक वार्ताएँ कुछ समय तक टालनी पड़ीं परन्तु 1942 के विशाल भारत छोड़ो आंदोलन का परिणाम था कि अंग्रेजों को संभावित सत्ता हस्तांतरण के बारे में भारतीय पक्षों के साथ बातचीत के लिए तैयार होना पड़ा।
- जिन्ना इस बात पर अड़े हुए थे कि कार्यकारिणी सभा के मुस्लिम सदस्यों का चुनाव करने का अधिकार केवल मुस्लिम लीग का ही है। वे सभा में सांप्रदायिक आधार वर वीटो की व्यवस्था भी चाहते थे। अत: सत्ता हस्तांतरण की वार्ता टूट गई।
- 1946 में फिर से प्रांतीय चुनाव हुए। सामान्य सीटों पर कांग्रेस को एकतरफा सफलता मिली। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भी ऐसी ही बेजोड़ सफलता मिली। अब लीग भारत के मुसलमानों की "एकमात्र प्रवक्ता" होने का दावा कर सकती थी।
- मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने तीन महीने तक भारत का दौरा किया और एक ढीले-ढाले त्रिस्तरीय महासंघ की स्थापना का झाव दिया। इसमें भारत एकीकृत ही रहने वाला था जिसकी केन्द्रीय सरकार के पास केवल विदेश. रक्षा और संचार का जिम्मा होता।
- आरंभ में सभी प्रमुख पार्टियों ने इस योजना को मान लिया था परन्तु बाद में यह समझौता ज्यादा देर नहीं चल पाया क्योंकि कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव को लीग और कांग्रेस, दोनों ने ही अस्वीकार कर दिया।
- पाकिस्तान की मांग को पूरा करवाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को 'प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस' (Direct Action Day) मनाने की घोषणा की। उसी दिन कलकत्ता में दंगे भड़क उठे जो कई दिनों तक चलते रहे। इन दंगों में कई हजार लोग मारे गए।
- मार्च 1947 में लगभग एक साल तक रक्तपात चलता रहा। इसका एक कारण था कि शासन की संस्थाएँ बिखर चुकी थीं। साल के अंत तक शासन-तंत्र पूरी तरह नष्ट हो चुका था। पूरा अमृतसर जिला रक्तपात में डूबा हुआ था।
- भारतीय सिपाही और पुलिस वाले भी हिंदू, मुसलमान या सिख के रूप में आचरण करने लगे थे। इससे सांप्रदायिक तनाव और अधिक बढ़ गया।
- सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के लिए गाँधीजी आगे आए। वे पूर्वी बंगाल के नोआखली (वर्तमान बाँग्लादेश) से बिहार के गाँवों में और उसके बाद कलकत्ता तथा दिल्ली के दंगाग्रस्त प्रदेशों की यात्रा पर निकल पड़े। हर जगह उन्होंने अल्पसंख्यसक समुदाय हिंदू अथवा मुसलमानों को दिलासा दिया।
- विभाजन का सबसे खूनी और विनाशकारी रूप पंजाब में सामने आया। पश्चिमी पंजाब से लगभग सभी हिंदुओं और सिखों को भारत की ओर तथा लगभग सभी पंजाबी भाषी मुसलमानों को पाकिस्तान की ओर हाँक दिया गया।
- खुरदेव सिंह एक सिख डॉक्टर थे। वे विभाजन के समय धर्मपुर में तैनात थे जो अब हिमाचल प्रदेश में पड़ता है। उन्होंने दिन-रात लगकर असंख्य प्रवासी मुसलमानों सिखों, हिंदुओं को भोजन, आश्रय और सुरक्षा प्रदान की।
- मविक वृतात रण डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे-इन सबसे विभाजन के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों तथा मुसीबतों को समझने में सहायता मिलती है।
- व्यथितरात स्मृतियों औ एक तरह का मौखिक स्रोत है-की एक विशेषता यहै कि उनमें हमें अनुभवों को और बारीकी से समझने का अवसर मिलता है इससे इतिहासकारों को बँटवारे जैसी घटनाओं के दौरान लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इस बारे में बहुरंगी और सजीव खुनांत लिखने में सहायता मिलती है।
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