Class 10th History Chapter 1 Hindi Notes
यूरोप में राष्टवाद का उदय
Class 10 History
हिंदी नोट्स
उदार राष्ट्रवाद की भावना: उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर के यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना का उदारवाद की भावना से गहरा तालमेल था। नए मध्यम वर्ग के लिए उदारवाद के मूल में व्यक्ति की स्वतंत्रता और समान अधिकार की भावनाएँ थीं। राजनैतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उदारवाद की भावना से ही आम सहमति से शासन के सिद्धांत को बल मिला होगा। उदारवाद के कारण ही तानाशाही और वंशानुगत विशेषाधिकारों की समाप्ति हुई। इससे एक संविधान की आवश्यकता महसूस होने लगी। साथ में प्रतिधिनित्व पर आधारित सरकार की भी। उन्नीसवीं सदी के उदारवादियों ने संपत्ति की अक्षुण्णता की बात को भी पक्के तौर पर रखना शुरु किया।
मताधिकार : फ्रांस में अभी भी हर नागरिक को मताधिकार नहीं मिला था। क्रांति के पिछले दौर में केवल ऐसे पुरुषों को ही मताधिकार मिले थे जिनके पास संपत्ति होती थी। जैकोबिन क्लबों के दौर में कुछ थोड़े समय के लिए हर वयस्क पुरुष को मताधिकार दिए गए थे। लेकिन नेपोलियन कोड ने फिर से पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी थी जिसमें सीमित लोगों के पास ही मताधिकार हुआ करता था। नेपोलियन के शासन काल में महिलाओं को नाबालिगों जैसा दर्जा दिया गया था जिसके कारण वे अपने पिता या पति के नियंत्रण में होती थीं। पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी की शुरुआत तक महिलाओं और संपत्तिविहीन पुरुषों के मताधिकार के लिए संघर्ष जारी रहा।
आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण: नेपोलियन कोड की एक और खास बात थी आर्थिक उदारीकरण। मध्यम वर्ग; जिसका अभी अभी जन्म हुआ था; भी आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में था। इसे समझने के लिए उन्नीसवीं सदी के पहले आधे हिस्से वाले ऐसे क्षेत्र का उदाहरण लेते हैं जहाँ जर्मन बोलने वाले लोग रहते थे। इस क्षेत्र में 39 प्रांत थे जो कई छोटी-छोटी इकाइयों में बँटे हुए थे। हर इकाई की अपनी अलग मुद्रा होती थी और मापन की अपनी अलग प्रणाली। यदि कोई व्यापारी हैम्बर्ग से न्यूरेम्बर्ग जाता था तो उसे ग्यारह चुंगी नाकाओं से गुजरना होता था और हर नाके पर लगभग 5% चुंगी देनी होती थी। चुंगी का भुगतान भार और माप के अनुसार दिया जाता था। विभिन्न स्थानों के भार और मापन में अत्यधिक अंतर होने के कारण इसमें बड़ी उलझन होती थी। दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि व्यवसाय के लिए बिलकुल प्रतिकूल माहौल थे जिससे आर्थिक गतिविधियों में विघ्न उत्पन्न होते थे। नए व्यावसायिक वर्ग की माँग थी कि एक एकल आर्थिक क्षेत्र बहाल की जाए ताकि सामान, लोगों और पूँजी के आदान प्रदान में कोई बाधा न उत्पन्न हो।
1834 में प्रसिया की पहल करने पर जोवरलिन के कस्टम यूनियन का गठन हुआ जिसमें बाद में अधिकाँश जर्मन राज्य भी शामिल हो गए। चुंगी की सीमाएँ समाप्त की गईं और मुद्राओं के प्रकार को तीस से घटाकर दो कर दिया गया। इस बीच रेलवे के जाल के विकास के कारण आवगमन की सुविधा को और बढ़ावा मिला। इससे एक तरह के आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास हुआ जिसने उस समय जड़ ले रही राष्ट्रवाद की भावना को बल प्रदान किया।
1815 के बाद एक नए रुढ़िवाद का जन्म : सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया की सम्मिलित ताकतों ने नेपोलियन को पराजित कर दिया। नेपोलियन की पराजय के बाद, यूरोप की सरकारें रुढ़िवाद को अपनाना चाहती थीं। रुढ़िवादियों का मानना था कि समाज और देश की परंपरागत संस्थाओं का संरक्षण जरूरी था। उनका मानना था कि राजतंत्र, चर्च, सामाजिक ढ़ाँचा, संपत्ति और परिवार के पुराने ढ़ाँचे को बचाकर रखा जाए। लेकिन उनमें से ज्यादातर लोग ये भी चाहते थे कि प्रशासन के क्षेत्र में नेपोलियन द्वारा लाए गए आधुनिक व्यवस्था को भी कायम रखा जाए। उनका मानना था कि उस प्रकार के आधुनिकीकरण से परंपरागत संस्थाओं को और बल मिलेगा। उन्हें लगता था कि एक आधुनिक सेना, एक कुशल प्रशासन, एक गतिशील अर्थव्यवस्था और सामंतवाद और दासता की समाप्ति से यूरोप के राजतंत्र को और मजबूती मिलेगी।
वियेना संधि: सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया (जो यूरोपियन शक्ति के प्रतिनिधि थे) ने यूरोप की नई रूपरेखा तय करने के लिए वियेना में एक मीटिंग की। इस कॉंग्रेस की मेहमाननवाजी का भार ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मेटर्निक पर था। इस मीटिंग में वियेना संधि का खाका तैयार किया गया। इस संधि का मुख्य लक्ष्य था नेपोलियन के काल में यूरोप में आए हुए अधिकाँश बदलावों को बदल देना। इस संधि के अनुसार कई कदम उठाए गए जिनमे से कुछ निम्नलिखित हैं:
- फ्रांसीसी क्रांति के दौरान बोर्बोन वंश को सत्ता से हटा दिया गया था। उसे फिर से सत्ता दे दी गई।
- फ्रांस की सीमा पर कई राज्य बनाए गए ताकि भविष्य में फ्रांस अपना साम्राज्य बढ़ाने की कोशिश न करे। उदाहरण के लिए; उत्तर में नीदरलैंड का राज्य स्थापित किया गया। इसी तरह दक्षिण में पिडमॉंट से जेनोआ को जोड़ा गया। प्रसिया को उसकी पश्चिमी सीमा के पास कई महत्वपूर्ण इलाके दिए गए। ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का कब्जा दिया गया।
- नेपोलियन ने 39 राज्यों का एक जर्मन संगठन बनाया था; उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया।
- पूरब में रूस को पोलैंड के कुछ भाग दिए गए, जबकि प्रसिया को सैक्सोनी का एक भाग।
1815 में जो रुढ़िवादी शासन व्यवस्थाएँ आईं वे सब तानाशाही प्रवृत्ति की थी। वे किसी प्रकार की आलोचना या विरोध को बर्दाश्त नहीं करते थे। उनमें से अधिकाँश ने अखबारों, किताबों, नाटकों और गानों में व्यक्त होने वाले विषय वस्तु पर कड़ा सेंसर कानून लगा दिया।
क्रांतिकारी: 1815 की घटनाओं के बाद सजा के डर से कई उदार राष्ट्रवादी जमींदोज हो गए थे।
जियुसेपे मेत्सीनी एक इटालियन क्रांतिकारी था। उसका जन्म 1807 में हुआ था। वह कार्बोनारी के सीक्रेट सोसाइटी का एक सदस्य बन गया। जब वह महज 24 साल का था, तभी लिगुरिया में क्रांति फैलाने की कोशिश में उसे 1831 में देशनिकाला दे दिया गया था। उसके बाद उसने दो अन्य सीक्रेट सोसाइटी का गठन किया। इनमें से पहला था मार्सेय में यंग ईटली और फिर बर्ने में यंग यूरोप। मेत्सीनी का मानना था कि भगवान ने राष्ट्र को मानवता की नैसर्गिक इकाई बनाया है। इसलिए इटली को छोटे छोटे राज्यों के बेमेल संगठन से बदलकर एक लोकतंत्र बनाने की जरूरत थी। मेत्सीनी का अनुसरण करते हुए लोगों ने जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और पोलैंड में ऐसी कई सीक्रेट सोसाइटी बनाई। रुढ़िवादियों को मेत्सिनी से डर लगता था।
इस बीच जब रुढ़िवादी ताकतें अपनी शक्ति को और मजबूत करने में जुटी थीं, उदारवादी और राष्ट्रवादी लोग क्रांति की भावना को अधिक से अधिक फैलाने की कोशिश कर रहे थे। इन लोगों में ज्यादातर मध्यम वर्ग के अभिजात लोग थे; जैसे कि प्रोफेसर, स्कूल टीचर, क्लर्क, और व्यवसायी।
फ्रांस में पहला उथल पुथल 1830 की जुलाई में हुआ। उदारवादी क्रांतिकारियों ने बोर्बोन के राजाओं को उखाड़ फेंका। उसके बाद एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई जिसका मुखिया लुई फिलिप को बनाया गया। जुलाई की उस क्रांति के बाद ब्रसेल्स में भी आक्रोश बढ़ने लगा जिसके फलस्वरूप नीदरलैंड के यूनाइटेड किंगडम से बेल्जियम अलग हो गया।
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