'सविनय अवज्ञा आंदोलन' के प्रति भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा अपनाए गए रुख को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : पहले विश्व युद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाफा कमाया था। अत: वे काफी शक्तिशाली हो चुके थे। अपने व्यवसाय को फैलाने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में बाधा आती थी। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और रुपया-स्टर्लिंग के विदेशी विनिमय अनुपात में परिवर्तन चाहते थे, ताकि आयात में कमी लाई जा सके। संघों का गठन : अपने व्यावसायिक हितों की सुरक्षा के लिए उन्होंने 1920 में 'भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस' (इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस) और 1927 में 'भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ' (फैडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री-फिक्की) का गठन किया। पुरुषोत्तम दास ठाकुर और जी.डी. बिड़ला जैसे जाने-माने उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया और पहले सिविल अवज्ञा आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इंकार कर दिया। अधिकतर व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जिसमें कारोबार पर औपनिवेशिक प्रतिबंध नहीं होगा और व्यापार एवं उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे।
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